आशंकाओं की बंद बोतल में,
कर लिया है सीमित खुद को.
जब होता हूँ मैं विस्तृत धुआं सा,
घुटना ही है सांसों की आवाजाही.
क्यूँ न तोड़ दो आयाम सारे,
विस्तृत होने दो प्रेम क्षितिज तक.
शायद मैं भी पा जाऊ विस्तार,
तुम में विस्तारीत होकर...........अमर (05.05.2013)
कर लिया है सीमित खुद को.
जब होता हूँ मैं विस्तृत धुआं सा,
घुटना ही है सांसों की आवाजाही.
क्यूँ न तोड़ दो आयाम सारे,
विस्तृत होने दो प्रेम क्षितिज तक.
शायद मैं भी पा जाऊ विस्तार,
तुम में विस्तारीत होकर...........अमर (05.05.2013)
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