शज़र से टूटे पत्ते चकराने लगे हैं
ज़मीं तक पहुँचने में ज़माने लगें है
कब तक गाफिल हैं खुद्दारी में हम
लोग हमको अब आजमाने लगे हैं
छुपा कर रखना तुम हुनर ए दोस्त
चोर आँखों से काज़ल चुराने लगें है
रहती नहीं अब गुलज़ार राहें दिल की
दिमाग की गली ख़यालात आने लगें है
गले लग कर अब कोई रोता नहीं "अमर"
कांधे पे हाथ रखकर लोग समझाने लगें है.
______________@ अमरसिंह तंवर (०७.०७.२०१३)
very nice
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