Wednesday, 24 July 2013

ग़ज़ल.



एक ख्वाब था अधुरा सा 
कोई गुज़रे दिल की राहों में.

जाज़िब है ज़ज्बा-ए-मुहब्बत 

क्यों डुबोना दिल को आहों में 

हम भी कभी बैठें फुर्सत से 

ए मुहब्बत तेरी पनाहों  में.

कुछ ख्वाब मुख़्तसर देखें हैं 
जिंदगी हमने तेरी निगाहों में.

इलज़ाम "अमर" हम सर लेंगे 

है नाम-ए-मुहब्बत गर गुनाहों में
__________@अमर सिंह तंवर.


जज़्बा=  आवेश, आवेग
जाज़िब= मनमोहक, आकर्षक

Thursday, 11 July 2013

सुन बे मौसम


सुन बे मौसम 
बहुत हुआ 
तूने भी 
छल किया 
तेरे लिए 
दिन रात भीगा 
अशआर लिखे 
गीत लिखे
स्वाभाव से विपरीत  
चिरौरी की 
तेरी नालायक 
और तू 
नामुराद 
कहता था 
मेरा कमाल देखना 
पिघला कर 
बहा ले आऊंगा उनको 
जमाल देखना 
ज़ज्बात सूखे 
अहसास सूखे 
वो सूखे 
हम सूखे 
किया क्या तूने 
अब तक ?
सुन ..
आज से 
बंद कर दे 
खुद को कहलाना 
मेघदूत.................@ अमर सिंह तंवर(११.०७.२०१३).

Tuesday, 9 July 2013

ग़ज़ल_"पहल"


पहल कीजिये हल निकलेगा 
जिंदगी है कोई ख्वाब तो नहीं.

चमकती  है तेरी आँखों में जो 
तनहा अश्कों की आब तो नहीं 

मचलता है दिल जब बरसे घटा 
अहसास है ये कोई ख़िताब तो नहीं  

हसीं बहुत है कमबख्त दर्द-ए-मुहब्बत
ये तोहफा है तेरा कोई अजाब तो नहीं 

झुका है सर मेरे इश्क के सामने 
शख्शियत को तेरी आदाब तो नहीं 

खुला हूँ कि पढ़ लें हाल- ए- दिल 
आशिक हूँ मैं कोई किताब तो नहीं.
______________अमर सिंह तंवर (०४ .०७.२०१३

Sunday, 7 July 2013

ग़ज़ल.



शज़र से टूटे पत्ते चकराने लगे हैं 
ज़मीं तक पहुँचने में ज़माने लगें है 

कब तक  गाफिल हैं खुद्दारी में हम 
लोग हमको अब आजमाने लगे हैं 

छुपा कर रखना तुम हुनर ए दोस्त 
चोर आँखों से काज़ल चुराने लगें है 

रहती नहीं अब गुलज़ार राहें दिल की 
दिमाग की गली ख़यालात आने लगें है 


गले लग कर अब कोई रोता नहीं "अमर"
कांधे पे हाथ रखकर लोग समझाने लगें है.

______________@ अमरसिंह तंवर (०७.०७.२०१३)

Wednesday, 26 June 2013

सैलाब में बहती कविता


बह रही थी
मेरी कविता
पानी के सैलाब में
मलबे के ढेर में
लफ्ज़ दबें
जा भिड़ी,बहते बहते
समय के आदिम
शिलाखंड से
मतिभ्रम या दिवास्वप्न ?
दिखा चोट से
कविता को मेरी

प्रकृति और मनुष्य
मानुष और प्रकृति
कुछ नहीं और
भावों का आकार चाहता
पूजन का आकांक्षी मनुष्य

दिया रूप प्रकृति ने
केशों में नदियाँ
गले में सरीसृप
कमर में मृगचर्म
शरीर पर धूलि
साश्वत प्रकृति
स्वरुप शिव

ढोए गए पत्थर
पहली बार
बना देवालय
लगने लगे
आस्था के मेले
पसरा कंक्रीट
बढ़ी महत्त्वाकांक्षाएं
गलें तक पहुंची

टूटा सब्र
खुली एक लट
और बह निकला
सैलाब मौत का
बह गया
आस्था की शक्ल लिए
महत्त्वाकांक्षाओं का कंक्रीट

कहता है मेरी
कविता का मन
प्रकृति का संरक्षण ही है
प्रकृति का पूजन
शिव का पूजन
अपने सच्चे और मूल रूप में.
___________@अमर सिंह तंवर (26.06.2013)

Tuesday, 18 June 2013

त्रासदी तेरे दर पर (केदारनाथ पर तबाही सी व्यथित मन कि व्यथा)




माना कि "अमर" नहीं होता कोई ,
अकाल मौतों का तांडव तेरे दर पर!!

ढहा दिया वो यकीन भी साथ घरों के,
चलते थे जो आँखे मूंदे तेरी डगर पर !!

यकीनन वहां नहीं हो तुम प्रभु ,
जहाँ लोग मन्नत मांगने आते है !!

बेईमानी,भ्रष्टाचार की गंगा में नहाते,
दान देकर पत्थर पर नाम लिखाते है!!

तुम तो बसते प्रभु मानव मन में,
मेहनतकश मजलूमों में नज़र आते हो !!

जब मिले उनको सहज अर्पण सम्मान,
उनकी दुआओं में तुम असर कर जाते हो !!
____________@अमर सिंह तंवर (19.06.2013)

Saturday, 15 June 2013

होंसले


उम्मीद के सिमटें परों को जरा,
तबियत से फैला के तो देखिये !!

छु लोगे यकीनन एक दिन आसमां,
नज़रों को ऊपर उठा के तो देखिये !!

कब तक छुपेगी काबिलियत तुमसे,
बंद होंसलों को ज़रा,आजमा के तो देखिये!!

कहते रहतें है लोग तो सदियों से,
खुद अपनी राह बना के तो देखिये!!

शिखर पर "अमर"होती है जगह कम, 
एक बार अपनी जगह बना के तो देखिये!!
_________________@ अमरसिंह तंवर(15.06.2013)

Thursday, 13 June 2013

मायूसियाँ

लाख बरसे बादल तो क्या ,
खुश्क आँखों में नमी आती नहीं ,
खुशियाँ खोजती जिंदगी की,
ग़मों से अदावत जाती नहीं  

लाख बिखेरो फूल फिजां में ,
डाल से टूटकर खुशबु आती नहीं,
एक बार जो लगी घुन रिश्तों को,
फिर कभी सलामती पे आती नहीं 

झूठी मुस्कुराहटें ,झूठे फ़साने 
जिंदगी अब तराने सुनाती नहीं 
मायूसियों की धुंध जो छाई हम पर 
हमदर्दी की किरणों से जाती नहीं.
______________copyright @अमर सिंह तंवर.

Wednesday, 12 June 2013

तमन्नाएँ

रिश्ते
राह तकते
खोई हुई
खुशियों की

वो फ़रिश्ते
बनकर बैठे है
ओढ़ चादर
अच्छाइयों की

तमन्नाएँ
घुट रही
दायरों के
कसाव से

मनुष्य है,
ज्वार तो उठेगा
हद में छलके
तो हैं महफूज़ किनारे .
_____________________________© अमर सिंह तंवर



Monday, 10 June 2013

अश्क -ए-जुदाई

_____________________ग़ज़ल_____________________

पीकर अश्क -ए-जुदाई ,करते रहते गला तर,
हिचकियाँ भी कमबख्त,अब आती नहीं हैं.



तेरे पीछे बहुत दूर तलक गयी नज़रें मेरी,
खुश्क हुई आँखों में अब. लौट कर आती नहीं है.



यूँ तो दुनिया मेरे लिए, पहले भी थी अजनबी,
तुझसे अलहदा पहचान मेरी, अब होती नहीं है.



इस तरहा बीमार ए दिल है. मुहब्बत का तेरी,
जिसे लग जाये ये बीमारी, कमबख्त जाती नहीं है.



जलता रहे दिल, तेरी झूंठी बेरुखी की आग से,
रहम की भीगी ठंडी हवाएं, मुझे कभी भाती नहीं है
.


_____________कॉपीराइट@ अमरसिंह तंवर

Wednesday, 5 June 2013

मुस्कुरायेंगी वसुंधरा


विश्व पर्यावरण दिवस पर सप्रेम ...

पारदर्शी कलेवर में लिपटे ,
निर्जीव फूल
अक्सर बनते है शोभा
हर अवसर की ,
मुस्कुराते चेहरे
आदान प्रदान करते
दुआओं के साथ ...

सार्थक हो जाती
यकीनन दुआएं
गर देने लगें लोग ,
एक नन्हा पौधा
सजीव,संभावनाओं
से भरपूर,

महकते रहेंगे  रिश्ते,
ताउम्र ,पीढ़ी दर पीढ़ी
जब जब आयेंगे
फूल,या लदेंगा  फलों से
आपका  दिया
संभावनाओ  भरा
सजीव उपहार.
मुस्कुरायेंगी
वसुंधरा
___________Copyright अमर सिंह तंवर 

Monday, 3 June 2013

यहीं कहीं है .

कहती है तुझे छूकर आती हवा,
मेरे अहसास अब तक वहीँ है
अब भी कहता हूँ थाम लो पलों को,
वक़्त किसी के लिए रुकता नहीं है.

न तुम जी पा रही हो,न मैं यहाँ,
दिल है कहीं  दिमाग कहीं है ,
जिस्म बस लेता है सांसे ,
जिन्दगी की झलक कहीं नहीं है

किसको है झुकना ,कौन खफा हुआ
इन बातों का कोई मतलब नहीं है
आज भी ये कहता है दिल
दूर नहीं तू यही कहीं है ...यहीं कहीं है .
_______Copyright अमर सिंह तंवर .

Sunday, 2 June 2013

सवालात,

जिंदगी की तपन से बचा रखे हैं,
निहायत जुदा है मेरे भीगे ज़ज्बात.

कितनी  आसानी से पूछ लिए थे तूने,
जिंदगी के सबसे मुश्किल सवालात.

अभी न बरसो ए घटायें मुझपर,
अच्छे नहीं अभी मेरे हालात .

ख़िज़ां की खुमारी तारी है मुझपर,
कभी होश में होंगे तो करेंगे बात.

बाकी है खाक को अर्श चूमना अभी,

है यकीनन तदबीर में वो करामात.
______________अमर सिंह तंवर (03.06.2013 )

Saturday, 1 June 2013

अहिल्या

घूमतें है इंद्र कई ,
गौतम के रूप मैं,
कई अहिल्या पाषाण बनी,
साजिशों की धूप में,

आब गयी ,अहसास गए,
आत्मा हुई पत्थर इस परिवेश में,
छुने से भी कहाँ उद्धार होगा,
मिलते रावण यहाँ राम के भेष में,

हर आंसू एक पत्थर है ,
ये जो पहाड़ देखते हो ,
आहों के ताप से तडकती  चट्टानों में
कैक्टस के शूल बनकर चुभते हो ...


_______कॉपीराइट © अमर सिंह तंवर

Thursday, 30 May 2013

दरमियाँ


जाओ तुम,
गर जाना चाहो,
खुदाया प्यार को,
न निभाओ तुम.

जिया था हमने
एक ही प्यार,
निभाते हुए,
दुनियादारी.
दुखता है दिल,
निभ रहा,
प्यार अब.
जीने लगी
दुनियादारी.

याद तो होगा,
जब होते थे हम,
कोई नहीं,
कोई भी नहीं,
न आया कभी,
दरमियाँ हमारे.

देख लो आज
बीच में है
अक्ल
अगल़ात
अज़ाब
अफ़सोस
तुम इस छोर
और मैं उस छोर....
____________कॉपीराइट © अमर सिंह तंवर

अक़्ल= बुद्धि, तर्क,
अगल़ात= अशुद्धियां
अज़ाब= पीड़ा, सन्ताप, दंड
अफ़सोस= शोक, पछतावा, उदासी

Saturday, 25 May 2013

मन मुसाफिर : एतबार

मन मुसाफिर : एतबार: गुलों को देखा जो खिलते , तेरे चेहरे पे एतबार आ गया, देख कर रंगत सुर्ख गुलाबों की, तेरे रुखसारों पे एतबार आ गया, भीगे मौसम में छाई ...

मन मुसाफिर : विस्तार,

मन मुसाफिर : विस्तार,: आशंकाओं की बंद बोतल में,  कर लिया है सीमित खुद को.  जब होता हूँ मैं विस्तृत धुआं सा, घुटना ही है सांसों की आवाजाही.  क्यूँ न तोड़ दो आय...

मन मुसाफिर : फसाना

मन मुसाफिर : फसाना: मेरी खामोशियों में भी फसाना ढूंढ लेती है, बड़ी शातिर है ये दुनिया बहाना ढूंढ लेती है. हकीकत जिद किए बैठी है चकनाचूर करने को, मगर हर आंख...

मन मुसाफिर : थका सूरज

मन मुसाफिर : थका सूरज: थका सूरज , अभी अभी  क्षितिज पे जाके टंग गया, पसीना उसका लहू बनकर , सागर को लाल कर  गया, पूछा मैंने  क्या मिला तुम्हे  इस त...

एतबार





गुलों को देखा जो खिलते ,
तेरे चेहरे पे एतबार आ गया,

देख कर रंगत सुर्ख गुलाबों की,
तेरे रुखसारों पे एतबार आ गया,

भीगे मौसम में छाई काली घटा,
तेरे गेसुओं पे एतबार आ गया.

दूर कहीं  फिर कोयल कूकी,
तेरी आवाज़ पे एतबार आ गया,

बैठा रहा था झील किनारे,
तेरी आँखों पे एतबार आ गया,

दरिया सी तेरी सीरत देखी,
खुदा की खुदाई पे एतबार आ गया...-© अमर सिंह तंवर

Thursday, 23 May 2013

थका सूरज







थका सूरज ,
अभी अभी 
क्षितिज पे जाके टंग गया,
पसीना उसका
लहू बनकर ,
सागर को लाल कर  गया,

पूछा मैंने 
क्या मिला तुम्हे 
इस तरहा
आग बरसाकर,

लम्बी  ख़ामोशी 
फिर बोला मुस्कुराकर 
तुम न समझोगे...
तपना पड़ता है 
आम  को भी 
मीठा होने के लिए.
तुम तो 
आदमी हो ...© Amar Singh Tanwar.

फसाना


मेरी खामोशियों में भी फसाना ढूंढ लेती है,

बड़ी शातिर है ये दुनिया बहाना ढूंढ लेती है.

हकीकत जिद किए बैठी है चकनाचूर करने को,

मगर हर आंख फिर सपना सुहाना ढूंढ लेती है..© अमर.

विस्तार,

आशंकाओं की बंद बोतल में, 

कर लिया है सीमित खुद को. 

जब होता हूँ मैं विस्तृत धुआं सा,

घुटना ही है सांसों की आवाजाही. 

क्यूँ न तोड़ दो आयाम सारे,

विस्तृत होने दो प्रेम क्षितिज तक. 

शायद मैं भी पा जाऊ विस्तार, 

तुम में विस्तारीत होकर...........अमर (05.05.2013)

इश्तेहार



पीले पड़े जूने अख़बार सी ,
जिंदगी में कुछ हर्फ़ ,
उभरे हैं गहरे ,
तैयार है इबारतें कुछ ,
मिटने की बैचैनी लिए !

गर्द ज़माने की समां गई,
वक़्त की हर तहों में, 
सिलवटें पड़ी यादों में,
जहाँ जहाँ से मोड़ी गयी !

कुछ चित्र भी है,
जुगाड़े हुए लम्हों के.
बदरंग से अब लगते हैं,
दास्तां मुकम्मल कहते हैं !

कुछ है इश्तेहार, 
तेरी बागी तमन्नाओं के, 
यूँ ही अब भी मुस्कुराते हैं 
चाहत के चश्मे से 
जब भी नज़र आते हैं !......© अमर.

पावस


यादों का बूंद भर पावस
 
मिलता है प्यासी रेत से 

रिसता है तेरी याद लिए 

कतरा कतरा ज़ज्ब होता ,

तपती जिंदगी के सहरा में .....© अमर.

जिंदगी के झंझावत में उलझा ,

कुछ झूठा ,कुछ सच्चा आदमी 

जानता है यकीनन,

अपना निर्दोष बचपन 

था वहीँ पर वो 

सबसे सच्चा ,

लौटता है बार बार 

फिर वहीँ ,अपने 

सबसे सच्चे पड़ाव 

बचपन की और........... © अमर.

दिलासा


मुझको यारों माफ़ करना ....

मेरी तनहाइयों में 
कडवे घूँट भरती है 
अंगूरी रातों की,
खट्टी मीठी कहानियां.

उल्टा लटका चाँद भी 
कह कहे लगाता है,
मुझको दिलासा देने जब 
तेरा फ़ोन आता है.

गुजरती रेल की सीटियाँ आती है 
नेपथ्य में मेरे गूंजती जाती है ,
इंजन से ज्यादा धुआं लिए हुए हूँ 
हाँ तेरी याद में आज पिए हुए हूँ...........© अमर.
हार या जीत 

नहीं होती

साझा करने में,

संचित किया आसमां.

प्रतिफल है,

घटा का, 

पिघलकर बरसना. .... © अमर.

अंदाज़

जियो कुछ इस अंदाज़ से "अमर" मरने का गम न रहे ,

जिंदगी के मकान में खुशियों के किरायेदार कम न रहे 

मुस्कुराहटों के रंगीं लिफाफों में किराये से लम्हे आते रहें 

हर साल खुशियों के मकां को मंजिल दर मंजिल बढ़ाते रहें !!... © अमर.

सुनो ...तुम

बेजाँ कोशिश छुपाने की,दिल के राज़ समझते हैं ,

ख़ामोशी जो कहती है .....वो अल्फाज़ समझते हैं .... © अमर.




तुम ...


ख्यालों के झीने से पर्दों के ,पीछे से शर्माती हो 
,
ए मेरी राहत-ए-जान ,क्या क्या तुम लिखवाती हो
.
कभी तो एक पल तनहा छोड़ ,खुद से मिल आऊं मैं 
,
मेरा वजूद भी तू ही है ,बता फिर किधर जाऊं मैं........© अमर.

Thursday, 9 May 2013


कुछ  ऐसा ही हूँ मैं और ये मन मेरा ,कभी गंभीरता के पर्वतों पर चिंतन के शिखर पर घंटो आँखे मूंदे ध्यान मग्न रहता है ,कभी सीधे छलांग लगा कर खेलने लगता है तलहटी की बचपनी मिटटी में ,कभी तमतमा जाता चेहरा व्यवस्था का नाकारापन देख कर तो कभी पेड़ से टूटते पुराने पत्ते को देख दुखी हो उठता है, कभी दहका पलाश तमन्नाओ को गरमा जाता है,तो कभी सुध बुध खो बैठता है अहसासों की ओस से भीगे गुलाबों को देखकर,हर अहसास शब्दों की  बारात लेकर आता है ,और मेरी कविता रक्स करने लगती है......© अमर.

"गुलाबी लिफाफा "

कुछ सोचे लम्हे मैंने, 
गुलाबी लिफाफे में ,
संभाल कर रखे थे,
देर रात.
पोस्ट करने थे,
तुम्हारी मुस्कुराती,
फोटो के साथ.
भूल गया हूँ,
सुबहा सुबहा की ,
आप धापी में,
अभी जाना था,
कमबख्त बिजली को भी.
सोचता हूँ शायद,
आई हो तुम,
हमेशा की तरहा,
मेरे सो जाने के बाद.
और ले गयीं हो,
लिफाफे को,
अपना नाम देखकर,
देखो लेट हो रहा हूँ ,
बता देना.
गर हो पास तुम्हारे.
वो भीगे लम्हों भरा ,
गुलाबी लिफाफा मेरा...© अमर.

"अमावस की चांदनी"

अमावस है आज 
चाँद नहीं है,
पक्का यकीं है,
है इत्मीनान भी,
उसी दिन से,

जब पहली बार,
देखा था उसे,
कुछ टूटा सा,
उसका हर अपब्र्हंश
संजो लेती हूँ मैं
आँखों के समंदर में,

वो पिघलकर ,
बढा देता हरदिन ,
मेरी आँखों की चांदनी ,
फ़ना है अब चाँद
खुद के वजूद से .

बस इसी पल से मैं
लगूंगी लौटाने
कतरा कतरा,
वजूद चाँद का
रफ्ता रफ्ता चाँद
फिर पा लेगा
अपनी सम्पूर्णता
बिना मुझे
खंडित किये .............© अमर.

जियो कुछ इस अंदाज़ से "अमर" मरने का गम न रहे ,
जिंदगी के मकान में खुशियों के किरायेदार कम न रहे 
मुस्कुराहटों के रंगीं लिफाफों में किराये से लम्हे आते रहें 
हर साल खुशियों के मकां को मंजिल दर मंजिल बढ़ाते रहें !!... © अमर.

Saturday, 23 February 2013

गुब्बारे


बंद कमरे में रंगीन गुब्बारों से, 
उड़ रहे है प्रयास मेरे तुम्हारे.
प्रेम की डोरी से बंधे हुए.. 
आओ इन्हें बांध ले ,
खड खड़ाने लगी है खिड़कियाँ भी 
फागुनी हवाओ के जोर से ..
डर है खुल न जाये कही,
खिड़की कोई .....

Wednesday, 20 February 2013


रोटी की एकरूपता टूटी
एकरस थी रोटी बिना कोनो के  
और बन गए परांठे 
कुछ चोकोर कुछ तिकोने 
कुछ परते बना ली खुद में 
उन की परतो के होम चढ़ गया 
दूधमुहों  का दूध, घी बनकर 
और रोटी अब भी बनती है गोल 
वृत्त की तरहा,कुनबे को समेटे .....अमर (20.02.2013)


सुनो ए रंगबिरंगी 
खुशियों में फुदकती चिड़िया,
तुम गा नहीं सकती,
एक डाल से दूसरी डाल
बेखौफ जा नहीं सकती..
क्या हुआ जो खिलते है फूल 
गाने से तुम्हारे, 
मौसम बलाए लेता है
गाने से तुम्हारे..
और हां ये चमकदार रंगों को 
छुपा कर रखा करो ,
काले लिबास में.
चाहे हो जाये इंसानियत काली,
जब हम ही बन जाये वहशी,
काली परत चढ़ी बस की रफ़्तार में .
और ये बंद करो तुम्हारी
ऊँची ऊँची उड़ाने..
होता नहीं बर्दाश्त हमसे ,
हमसे ऊँचा उड़ना तुम्हारा.
और सुनो रंग बिरंगी चिड़िया
कैसे उड़ लेती हो आखिर ..?
नहीं भूलते हम कतरना
पंख तुम्हारे,
कभी धर्म तो कभी समाज की
दोधारी केंचियों से,
सुन ओ रंगबिरंगी चिड़िया
अब नहीं गाओगी तुम
बस कह दिया सो
कह दिया हमने...
सुन ओ रंगबिरंगी चिड़िया
अब नहीं गाओगी तुम
बस कह दिया सो
कह दिया हमने...
अमर.. Copyright ©.. दिनांक 10.02.2013.
तेरी हर शै में तेरा दीदार है मेरे प्रभु ..
जाने क्यों लोग अदेखा कहते है तुझे ...अमर.
मायने रखता है 
बस महसूस करना..
कल्पना और यथार्थ 
की महीन रेखा में 
डूबती उतराती है 
आभास की तीव्रता तब 
जाने कहा खो जाती है 
जमीनी दूरिया और 
बन जाती है आइना 
ये आभासी दीवार....(अमर).
धरा का नृत्य 
शाम रंगों से सरोबार 
रुपहला आसमां
घर लौटते 
पंछियों का कलरव 
कब देखा था ?
आखिरी बार...
याद नहीं अब
ढलते ही शाम
लेने लगते है रूप
मेरे डर,अवसाद मेरे.
नाचने लगते है
पहले हलके फिर
तेज़ और तेज़.
ढूँढने लगता हू मैं
और गहरा रंग,
या स्याह कालिख.......अमर © (19.02.2013)