Wednesday, 30 July 2014

महकते रिश्ते


नजरें झुका लेती वो, 

जब भी उसकी, 

आँखों में हूँ झांकता। 

जाने क्यूँ वो शक्श मुझे, 

कभी पराया नहीं लगता। 

दिल चुराता है उनका, 

देख कर नहीं देखना। 

लबों को बंद कर, 

आँखों से सब कहना। 

अनाम रिश्ते का, 

दरमियाँ महकना। 

तनहा रातों में जैसे, 

हरसिंगार का खिलना। 

तनहाइयों के अश्क, 

सुबहा ओस से दमकते हैं. 

क्या हुआ जो कहा नहीं, 

वो हमारे और हम उनके, 

दिल में रहते है मन में बसते हैं !!!……@अमर। 

Saturday, 14 June 2014

अनदेखियों की
दलदली
ज़मीं पर
उगाया गया
अलगाव
जब जब अपने
उपेक्षाओं के
नव पल्लव
देख देख
खुश होता है
विचारों के
बवंडर
ख्यालों के
उड़ते पत्ते
इंतज़ार की
धूल लिए
शब्दों की
पगडण्डी का
अंतिम सिरा
तेरे मन की
देहलीज़ पर
ख़त्म होता है.......@ अमर (१४.०६.२०१४ )

Tuesday, 6 May 2014


चारों ओर 

कोलाहल में 


आवाजों से


बोझिल 


माहौल में 


कविताओ 


शेरों की दाद में 


अनकहा पढ़े जाने 


की आस में 


अवचेतन गहने के 


विश्वास में 


जो अबोला है 


निगाहों का 


पहरा है 


फिर भी दरम्यां 


ठहरा है 


जो "मौन" है 


उसे मौन ही 


रखना 


उतावली में 


न कहना 


चाहता हूँ 


पढ़ते हुए 


खामोशियों को 


परत दर परत 


बीतूं मैं भी..


छोटी है खुशियाँ 


राह-ए-जिंदगी 


है लम्बी बहुत........© 2014 अमर.


न होकर भी थी 
तुम साथ मेरे 
जब वादियों में 
उतरती थी 
शाम की 
परछाईयां 
घुल रहे थे 
ख्याल मेरे 
लिपटकर रेशमी 
अहसासों से तेरे 
देवदार के पीछे 
लाल पिरामिड सी 
छत वाले 
मकान की ओट में 
आसमां भी 
झुक आया था 
बेशर्म सा 
न जाने क्यूँ 
इतने करीब 
सुर्ख सेबों 
का रंग 
उतर आया था 
गालों पर 
तुम्हारे 
पता है 

कितने 
इन्द्रधनुष 
लौटते सूरज की 
रश्मियाँ 
बना गयी थी 
आँखों में तुम्हारी 
मैं बावरे सा 
अपलक 
और तुम 
इन्द्रधनुषी रंगों में 
सराबोर 
जज़्ब कर रही थी 
कतरा कतरा 
पिघलते लम्हों को 
देखा था मैंने 
बहने लगी थी 
चोटियों पर 
ज़मी बर्फ भी ..........© 2014 अमर

गवारा नहीं 
 
रखूं अमानती 

 
सीपियों को 

 
किसी 

 
शो केस में, 

 
रखता हूँ उन्हें 

 
मन की तिजोरी 

 
मखमल की तह में 

 
छुपाकर सबसे 

 
मचलती है लहरें 

 
किनारों के 

 
एक स्पर्श 

 
भर के लिए 



लौट जाती है 

 
फिर आने के लिए 

 
जिंदगी की रेत पर 

 
निशां छोड़कर 

 
दे जाती है अपने 

 
मन की सीपी में छुपे 

 
मोतियों से अहसास 

 
ताउम्र सहेज कर

 
रखने के लिए ...........© अमर (२०१४)

Wednesday, 24 July 2013

ग़ज़ल.



एक ख्वाब था अधुरा सा 
कोई गुज़रे दिल की राहों में.

जाज़िब है ज़ज्बा-ए-मुहब्बत 

क्यों डुबोना दिल को आहों में 

हम भी कभी बैठें फुर्सत से 

ए मुहब्बत तेरी पनाहों  में.

कुछ ख्वाब मुख़्तसर देखें हैं 
जिंदगी हमने तेरी निगाहों में.

इलज़ाम "अमर" हम सर लेंगे 

है नाम-ए-मुहब्बत गर गुनाहों में
__________@अमर सिंह तंवर.


जज़्बा=  आवेश, आवेग
जाज़िब= मनमोहक, आकर्षक

Thursday, 11 July 2013

सुन बे मौसम


सुन बे मौसम 
बहुत हुआ 
तूने भी 
छल किया 
तेरे लिए 
दिन रात भीगा 
अशआर लिखे 
गीत लिखे
स्वाभाव से विपरीत  
चिरौरी की 
तेरी नालायक 
और तू 
नामुराद 
कहता था 
मेरा कमाल देखना 
पिघला कर 
बहा ले आऊंगा उनको 
जमाल देखना 
ज़ज्बात सूखे 
अहसास सूखे 
वो सूखे 
हम सूखे 
किया क्या तूने 
अब तक ?
सुन ..
आज से 
बंद कर दे 
खुद को कहलाना 
मेघदूत.................@ अमर सिंह तंवर(११.०७.२०१३).