मन मुसाफिर ठिठका है जिन ठिकानो पर...बस वही की बानगी नज़र करता हूँ ......मेरे शब्दों में कुछ द्रश्य ....
Wednesday, 26 June 2013
सैलाब में बहती कविता
बह रही थी
मेरी कविता
पानी के सैलाब में
मलबे के ढेर में
लफ्ज़ दबें
जा भिड़ी,बहते बहते
समय के आदिम
शिलाखंड से
मतिभ्रम या दिवास्वप्न ?
दिखा चोट से
कविता को मेरी
प्रकृति और मनुष्य
मानुष और प्रकृति
कुछ नहीं और
भावों का आकार चाहता
पूजन का आकांक्षी मनुष्य
दिया रूप प्रकृति ने
केशों में नदियाँ
गले में सरीसृप
कमर में मृगचर्म
शरीर पर धूलि
साश्वत प्रकृति
स्वरुप शिव
ढोए गए पत्थर
पहली बार
बना देवालय
लगने लगे
आस्था के मेले
पसरा कंक्रीट
बढ़ी महत्त्वाकांक्षाएं
गलें तक पहुंची
टूटा सब्र
खुली एक लट
और बह निकला
सैलाब मौत का
बह गया
आस्था की शक्ल लिए
महत्त्वाकांक्षाओं का कंक्रीट
कहता है मेरी
कविता का मन
प्रकृति का संरक्षण ही है
प्रकृति का पूजन
शिव का पूजन
अपने सच्चे और मूल रूप में.
___________@अमर सिंह तंवर (26.06.2013)
Tuesday, 18 June 2013
त्रासदी तेरे दर पर (केदारनाथ पर तबाही सी व्यथित मन कि व्यथा)
माना कि "अमर" नहीं होता कोई ,
अकाल मौतों का तांडव तेरे दर पर!!
ढहा दिया वो यकीन भी साथ घरों के,
चलते थे जो आँखे मूंदे तेरी डगर पर !!
यकीनन वहां नहीं हो तुम प्रभु ,
जहाँ लोग मन्नत मांगने आते है !!
बेईमानी,भ्रष्टाचार की गंगा में नहाते,
दान देकर पत्थर पर नाम लिखाते है!!
तुम तो बसते प्रभु मानव मन में,
मेहनतकश मजलूमों में नज़र आते हो !!
जब मिले उनको सहज अर्पण सम्मान,
उनकी दुआओं में तुम असर कर जाते हो !!
____________@अमर सिंह तंवर (19.06.2013)
Saturday, 15 June 2013
होंसले
उम्मीद के सिमटें परों को जरा,
तबियत से फैला के तो देखिये !!
छु लोगे यकीनन एक दिन आसमां,
नज़रों को ऊपर उठा के तो देखिये !!
कब तक छुपेगी काबिलियत तुमसे,
बंद होंसलों को ज़रा,आजमा के तो देखिये!!
कहते रहतें है लोग तो सदियों से,
खुद अपनी राह बना के तो देखिये!!
शिखर पर "अमर"होती है जगह कम,
एक बार अपनी जगह बना के तो देखिये!!
_________________@ अमरसिंह तंवर(15.06.2013)
Thursday, 13 June 2013
मायूसियाँ
लाख बरसे बादल तो क्या ,
खुश्क आँखों में नमी आती नहीं ,
खुशियाँ खोजती जिंदगी की,
ग़मों से अदावत जाती नहीं
लाख बिखेरो फूल फिजां में ,
डाल से टूटकर खुशबु आती नहीं,
एक बार जो लगी घुन रिश्तों को,
फिर कभी सलामती पे आती नहीं
झूठी मुस्कुराहटें ,झूठे फ़साने
जिंदगी अब तराने सुनाती नहीं
मायूसियों की धुंध जो छाई हम पर
हमदर्दी की किरणों से जाती नहीं.
______________copyright @अमर सिंह तंवर.
खुश्क आँखों में नमी आती नहीं ,
खुशियाँ खोजती जिंदगी की,
ग़मों से अदावत जाती नहीं
लाख बिखेरो फूल फिजां में ,
डाल से टूटकर खुशबु आती नहीं,
एक बार जो लगी घुन रिश्तों को,
फिर कभी सलामती पे आती नहीं
झूठी मुस्कुराहटें ,झूठे फ़साने
जिंदगी अब तराने सुनाती नहीं
मायूसियों की धुंध जो छाई हम पर
हमदर्दी की किरणों से जाती नहीं.
______________copyright @अमर सिंह तंवर.
Wednesday, 12 June 2013
तमन्नाएँ
रिश्ते
राह तकते
खोई हुई
खुशियों की
वो फ़रिश्ते
बनकर बैठे है
ओढ़ चादर
अच्छाइयों की
तमन्नाएँ
घुट रही
दायरों के
कसाव से
मनुष्य है,
ज्वार तो उठेगा
हद में छलके
तो हैं महफूज़ किनारे .
_____________________________© अमर सिंह तंवर
राह तकते
खोई हुई
खुशियों की
वो फ़रिश्ते
बनकर बैठे है
ओढ़ चादर
अच्छाइयों की
तमन्नाएँ
घुट रही
दायरों के
कसाव से
मनुष्य है,
ज्वार तो उठेगा
हद में छलके
तो हैं महफूज़ किनारे .
_____________________________© अमर सिंह तंवर
Monday, 10 June 2013
अश्क -ए-जुदाई
_____________________ग़ज़ल_____________________
पीकर अश्क -ए-जुदाई ,करते रहते गला तर,
हिचकियाँ भी कमबख्त,अब आती नहीं हैं.
तेरे पीछे बहुत दूर तलक गयी नज़रें मेरी,
खुश्क हुई आँखों में अब. लौट कर आती नहीं है.
यूँ तो दुनिया मेरे लिए, पहले भी थी अजनबी,
तुझसे अलहदा पहचान मेरी, अब होती नहीं है.
इस तरहा बीमार ए दिल है. मुहब्बत का तेरी,
जिसे लग जाये ये बीमारी, कमबख्त जाती नहीं है.
जलता रहे दिल, तेरी झूंठी बेरुखी की आग से,
रहम की भीगी ठंडी हवाएं, मुझे कभी भाती नहीं है.
_____________कॉपीराइट@ अमरसिंह तंवर
पीकर अश्क -ए-जुदाई ,करते रहते गला तर,
हिचकियाँ भी कमबख्त,अब आती नहीं हैं.
तेरे पीछे बहुत दूर तलक गयी नज़रें मेरी,
खुश्क हुई आँखों में अब. लौट कर आती नहीं है.
यूँ तो दुनिया मेरे लिए, पहले भी थी अजनबी,
तुझसे अलहदा पहचान मेरी, अब होती नहीं है.
इस तरहा बीमार ए दिल है. मुहब्बत का तेरी,
जिसे लग जाये ये बीमारी, कमबख्त जाती नहीं है.
जलता रहे दिल, तेरी झूंठी बेरुखी की आग से,
रहम की भीगी ठंडी हवाएं, मुझे कभी भाती नहीं है.
_____________कॉपीराइट@ अमरसिंह तंवर
Wednesday, 5 June 2013
मुस्कुरायेंगी वसुंधरा
विश्व पर्यावरण दिवस पर सप्रेम ...
पारदर्शी कलेवर में लिपटे ,
निर्जीव फूल
अक्सर बनते है शोभा
हर अवसर की ,
मुस्कुराते चेहरे
आदान प्रदान करते
दुआओं के साथ ...
सार्थक हो जाती
यकीनन दुआएं
गर देने लगें लोग ,
एक नन्हा पौधा
सजीव,संभावनाओं
से भरपूर,
महकते रहेंगे रिश्ते,
ताउम्र ,पीढ़ी दर पीढ़ी
जब जब आयेंगे
फूल,या लदेंगा फलों से
आपका दिया
संभावनाओ भरा
सजीव उपहार.
मुस्कुरायेंगी
वसुंधरा
___________Copyright
Monday, 3 June 2013
यहीं कहीं है .
कहती है तुझे छूकर आती हवा,
मेरे अहसास अब तक वहीँ है
अब भी कहता हूँ थाम लो पलों को,
वक़्त किसी के लिए रुकता नहीं है.
न तुम जी पा रही हो,न मैं यहाँ,
दिल है कहीं दिमाग कहीं है ,
जिस्म बस लेता है सांसे ,
जिन्दगी की झलक कहीं नहीं है
किसको है झुकना ,कौन खफा हुआ
इन बातों का कोई मतलब नहीं है
आज भी ये कहता है दिल
दूर नहीं तू यही कहीं है ...यहीं कहीं है .
_______Copyright@ अमर सिंह तंवर .
मेरे अहसास अब तक वहीँ है
अब भी कहता हूँ थाम लो पलों को,
वक़्त किसी के लिए रुकता नहीं है.
न तुम जी पा रही हो,न मैं यहाँ,
दिल है कहीं दिमाग कहीं है ,
जिस्म बस लेता है सांसे ,
जिन्दगी की झलक कहीं नहीं है
किसको है झुकना ,कौन खफा हुआ
इन बातों का कोई मतलब नहीं है
आज भी ये कहता है दिल
दूर नहीं तू यही कहीं है ...यहीं कहीं है .
_______Copyright
Sunday, 2 June 2013
सवालात,
जिंदगी की तपन से बचा रखे हैं,
निहायत जुदा है मेरे भीगे ज़ज्बात.
कितनी आसानी से पूछ लिए थे तूने,
जिंदगी के सबसे मुश्किल सवालात.
अभी न बरसो ए घटायें मुझपर,
अच्छे नहीं अभी मेरे हालात .
ख़िज़ां की खुमारी तारी है मुझपर,
कभी होश में होंगे तो करेंगे बात.
बाकी है खाक को अर्श चूमना अभी,
है यकीनन तदबीर में वो करामात.
______________अमर सिंह तंवर (03.06.2013 )
निहायत जुदा है मेरे भीगे ज़ज्बात.
कितनी आसानी से पूछ लिए थे तूने,
जिंदगी के सबसे मुश्किल सवालात.
अभी न बरसो ए घटायें मुझपर,
अच्छे नहीं अभी मेरे हालात .
ख़िज़ां की खुमारी तारी है मुझपर,
कभी होश में होंगे तो करेंगे बात.
बाकी है खाक को अर्श चूमना अभी,
है यकीनन तदबीर में वो करामात.
______________अमर सिंह तंवर (03.06.2013 )
Saturday, 1 June 2013
अहिल्या
घूमतें है इंद्र कई ,
गौतम के रूप मैं,
कई अहिल्या पाषाण बनी,
साजिशों की धूप में,
आब गयी ,अहसास गए,
आत्मा हुई पत्थर इस परिवेश में,
छुने से भी कहाँ उद्धार होगा,
मिलते रावण यहाँ राम के भेष में,
हर आंसू एक पत्थर है ,
ये जो पहाड़ देखते हो ,
आहों के ताप से तडकती चट्टानों में
कैक्टस के शूल बनकर चुभते हो ...
_______कॉपीराइट © अमर सिंह तंवर
गौतम के रूप मैं,
कई अहिल्या पाषाण बनी,
साजिशों की धूप में,
आब गयी ,अहसास गए,
आत्मा हुई पत्थर इस परिवेश में,
छुने से भी कहाँ उद्धार होगा,
मिलते रावण यहाँ राम के भेष में,
हर आंसू एक पत्थर है ,
ये जो पहाड़ देखते हो ,
आहों के ताप से तडकती चट्टानों में
कैक्टस के शूल बनकर चुभते हो ...
_______कॉपीराइट © अमर सिंह तंवर
Subscribe to:
Posts (Atom)


