Saturday, 23 February 2013

गुब्बारे


बंद कमरे में रंगीन गुब्बारों से, 
उड़ रहे है प्रयास मेरे तुम्हारे.
प्रेम की डोरी से बंधे हुए.. 
आओ इन्हें बांध ले ,
खड खड़ाने लगी है खिड़कियाँ भी 
फागुनी हवाओ के जोर से ..
डर है खुल न जाये कही,
खिड़की कोई .....

Wednesday, 20 February 2013


रोटी की एकरूपता टूटी
एकरस थी रोटी बिना कोनो के  
और बन गए परांठे 
कुछ चोकोर कुछ तिकोने 
कुछ परते बना ली खुद में 
उन की परतो के होम चढ़ गया 
दूधमुहों  का दूध, घी बनकर 
और रोटी अब भी बनती है गोल 
वृत्त की तरहा,कुनबे को समेटे .....अमर (20.02.2013)


सुनो ए रंगबिरंगी 
खुशियों में फुदकती चिड़िया,
तुम गा नहीं सकती,
एक डाल से दूसरी डाल
बेखौफ जा नहीं सकती..
क्या हुआ जो खिलते है फूल 
गाने से तुम्हारे, 
मौसम बलाए लेता है
गाने से तुम्हारे..
और हां ये चमकदार रंगों को 
छुपा कर रखा करो ,
काले लिबास में.
चाहे हो जाये इंसानियत काली,
जब हम ही बन जाये वहशी,
काली परत चढ़ी बस की रफ़्तार में .
और ये बंद करो तुम्हारी
ऊँची ऊँची उड़ाने..
होता नहीं बर्दाश्त हमसे ,
हमसे ऊँचा उड़ना तुम्हारा.
और सुनो रंग बिरंगी चिड़िया
कैसे उड़ लेती हो आखिर ..?
नहीं भूलते हम कतरना
पंख तुम्हारे,
कभी धर्म तो कभी समाज की
दोधारी केंचियों से,
सुन ओ रंगबिरंगी चिड़िया
अब नहीं गाओगी तुम
बस कह दिया सो
कह दिया हमने...
सुन ओ रंगबिरंगी चिड़िया
अब नहीं गाओगी तुम
बस कह दिया सो
कह दिया हमने...
अमर.. Copyright ©.. दिनांक 10.02.2013.
तेरी हर शै में तेरा दीदार है मेरे प्रभु ..
जाने क्यों लोग अदेखा कहते है तुझे ...अमर.
मायने रखता है 
बस महसूस करना..
कल्पना और यथार्थ 
की महीन रेखा में 
डूबती उतराती है 
आभास की तीव्रता तब 
जाने कहा खो जाती है 
जमीनी दूरिया और 
बन जाती है आइना 
ये आभासी दीवार....(अमर).
धरा का नृत्य 
शाम रंगों से सरोबार 
रुपहला आसमां
घर लौटते 
पंछियों का कलरव 
कब देखा था ?
आखिरी बार...
याद नहीं अब
ढलते ही शाम
लेने लगते है रूप
मेरे डर,अवसाद मेरे.
नाचने लगते है
पहले हलके फिर
तेज़ और तेज़.
ढूँढने लगता हू मैं
और गहरा रंग,
या स्याह कालिख.......अमर © (19.02.2013)