Thursday, 30 May 2013

दरमियाँ


जाओ तुम,
गर जाना चाहो,
खुदाया प्यार को,
न निभाओ तुम.

जिया था हमने
एक ही प्यार,
निभाते हुए,
दुनियादारी.
दुखता है दिल,
निभ रहा,
प्यार अब.
जीने लगी
दुनियादारी.

याद तो होगा,
जब होते थे हम,
कोई नहीं,
कोई भी नहीं,
न आया कभी,
दरमियाँ हमारे.

देख लो आज
बीच में है
अक्ल
अगल़ात
अज़ाब
अफ़सोस
तुम इस छोर
और मैं उस छोर....
____________कॉपीराइट © अमर सिंह तंवर

अक़्ल= बुद्धि, तर्क,
अगल़ात= अशुद्धियां
अज़ाब= पीड़ा, सन्ताप, दंड
अफ़सोस= शोक, पछतावा, उदासी

Saturday, 25 May 2013

मन मुसाफिर : एतबार

मन मुसाफिर : एतबार: गुलों को देखा जो खिलते , तेरे चेहरे पे एतबार आ गया, देख कर रंगत सुर्ख गुलाबों की, तेरे रुखसारों पे एतबार आ गया, भीगे मौसम में छाई ...

मन मुसाफिर : विस्तार,

मन मुसाफिर : विस्तार,: आशंकाओं की बंद बोतल में,  कर लिया है सीमित खुद को.  जब होता हूँ मैं विस्तृत धुआं सा, घुटना ही है सांसों की आवाजाही.  क्यूँ न तोड़ दो आय...

मन मुसाफिर : फसाना

मन मुसाफिर : फसाना: मेरी खामोशियों में भी फसाना ढूंढ लेती है, बड़ी शातिर है ये दुनिया बहाना ढूंढ लेती है. हकीकत जिद किए बैठी है चकनाचूर करने को, मगर हर आंख...

मन मुसाफिर : थका सूरज

मन मुसाफिर : थका सूरज: थका सूरज , अभी अभी  क्षितिज पे जाके टंग गया, पसीना उसका लहू बनकर , सागर को लाल कर  गया, पूछा मैंने  क्या मिला तुम्हे  इस त...

एतबार





गुलों को देखा जो खिलते ,
तेरे चेहरे पे एतबार आ गया,

देख कर रंगत सुर्ख गुलाबों की,
तेरे रुखसारों पे एतबार आ गया,

भीगे मौसम में छाई काली घटा,
तेरे गेसुओं पे एतबार आ गया.

दूर कहीं  फिर कोयल कूकी,
तेरी आवाज़ पे एतबार आ गया,

बैठा रहा था झील किनारे,
तेरी आँखों पे एतबार आ गया,

दरिया सी तेरी सीरत देखी,
खुदा की खुदाई पे एतबार आ गया...-© अमर सिंह तंवर

Thursday, 23 May 2013

थका सूरज







थका सूरज ,
अभी अभी 
क्षितिज पे जाके टंग गया,
पसीना उसका
लहू बनकर ,
सागर को लाल कर  गया,

पूछा मैंने 
क्या मिला तुम्हे 
इस तरहा
आग बरसाकर,

लम्बी  ख़ामोशी 
फिर बोला मुस्कुराकर 
तुम न समझोगे...
तपना पड़ता है 
आम  को भी 
मीठा होने के लिए.
तुम तो 
आदमी हो ...© Amar Singh Tanwar.

फसाना


मेरी खामोशियों में भी फसाना ढूंढ लेती है,

बड़ी शातिर है ये दुनिया बहाना ढूंढ लेती है.

हकीकत जिद किए बैठी है चकनाचूर करने को,

मगर हर आंख फिर सपना सुहाना ढूंढ लेती है..© अमर.

विस्तार,

आशंकाओं की बंद बोतल में, 

कर लिया है सीमित खुद को. 

जब होता हूँ मैं विस्तृत धुआं सा,

घुटना ही है सांसों की आवाजाही. 

क्यूँ न तोड़ दो आयाम सारे,

विस्तृत होने दो प्रेम क्षितिज तक. 

शायद मैं भी पा जाऊ विस्तार, 

तुम में विस्तारीत होकर...........अमर (05.05.2013)

इश्तेहार



पीले पड़े जूने अख़बार सी ,
जिंदगी में कुछ हर्फ़ ,
उभरे हैं गहरे ,
तैयार है इबारतें कुछ ,
मिटने की बैचैनी लिए !

गर्द ज़माने की समां गई,
वक़्त की हर तहों में, 
सिलवटें पड़ी यादों में,
जहाँ जहाँ से मोड़ी गयी !

कुछ चित्र भी है,
जुगाड़े हुए लम्हों के.
बदरंग से अब लगते हैं,
दास्तां मुकम्मल कहते हैं !

कुछ है इश्तेहार, 
तेरी बागी तमन्नाओं के, 
यूँ ही अब भी मुस्कुराते हैं 
चाहत के चश्मे से 
जब भी नज़र आते हैं !......© अमर.

पावस


यादों का बूंद भर पावस
 
मिलता है प्यासी रेत से 

रिसता है तेरी याद लिए 

कतरा कतरा ज़ज्ब होता ,

तपती जिंदगी के सहरा में .....© अमर.

जिंदगी के झंझावत में उलझा ,

कुछ झूठा ,कुछ सच्चा आदमी 

जानता है यकीनन,

अपना निर्दोष बचपन 

था वहीँ पर वो 

सबसे सच्चा ,

लौटता है बार बार 

फिर वहीँ ,अपने 

सबसे सच्चे पड़ाव 

बचपन की और........... © अमर.

दिलासा


मुझको यारों माफ़ करना ....

मेरी तनहाइयों में 
कडवे घूँट भरती है 
अंगूरी रातों की,
खट्टी मीठी कहानियां.

उल्टा लटका चाँद भी 
कह कहे लगाता है,
मुझको दिलासा देने जब 
तेरा फ़ोन आता है.

गुजरती रेल की सीटियाँ आती है 
नेपथ्य में मेरे गूंजती जाती है ,
इंजन से ज्यादा धुआं लिए हुए हूँ 
हाँ तेरी याद में आज पिए हुए हूँ...........© अमर.
हार या जीत 

नहीं होती

साझा करने में,

संचित किया आसमां.

प्रतिफल है,

घटा का, 

पिघलकर बरसना. .... © अमर.

अंदाज़

जियो कुछ इस अंदाज़ से "अमर" मरने का गम न रहे ,

जिंदगी के मकान में खुशियों के किरायेदार कम न रहे 

मुस्कुराहटों के रंगीं लिफाफों में किराये से लम्हे आते रहें 

हर साल खुशियों के मकां को मंजिल दर मंजिल बढ़ाते रहें !!... © अमर.

सुनो ...तुम

बेजाँ कोशिश छुपाने की,दिल के राज़ समझते हैं ,

ख़ामोशी जो कहती है .....वो अल्फाज़ समझते हैं .... © अमर.




तुम ...


ख्यालों के झीने से पर्दों के ,पीछे से शर्माती हो 
,
ए मेरी राहत-ए-जान ,क्या क्या तुम लिखवाती हो
.
कभी तो एक पल तनहा छोड़ ,खुद से मिल आऊं मैं 
,
मेरा वजूद भी तू ही है ,बता फिर किधर जाऊं मैं........© अमर.

Thursday, 9 May 2013


कुछ  ऐसा ही हूँ मैं और ये मन मेरा ,कभी गंभीरता के पर्वतों पर चिंतन के शिखर पर घंटो आँखे मूंदे ध्यान मग्न रहता है ,कभी सीधे छलांग लगा कर खेलने लगता है तलहटी की बचपनी मिटटी में ,कभी तमतमा जाता चेहरा व्यवस्था का नाकारापन देख कर तो कभी पेड़ से टूटते पुराने पत्ते को देख दुखी हो उठता है, कभी दहका पलाश तमन्नाओ को गरमा जाता है,तो कभी सुध बुध खो बैठता है अहसासों की ओस से भीगे गुलाबों को देखकर,हर अहसास शब्दों की  बारात लेकर आता है ,और मेरी कविता रक्स करने लगती है......© अमर.

"गुलाबी लिफाफा "

कुछ सोचे लम्हे मैंने, 
गुलाबी लिफाफे में ,
संभाल कर रखे थे,
देर रात.
पोस्ट करने थे,
तुम्हारी मुस्कुराती,
फोटो के साथ.
भूल गया हूँ,
सुबहा सुबहा की ,
आप धापी में,
अभी जाना था,
कमबख्त बिजली को भी.
सोचता हूँ शायद,
आई हो तुम,
हमेशा की तरहा,
मेरे सो जाने के बाद.
और ले गयीं हो,
लिफाफे को,
अपना नाम देखकर,
देखो लेट हो रहा हूँ ,
बता देना.
गर हो पास तुम्हारे.
वो भीगे लम्हों भरा ,
गुलाबी लिफाफा मेरा...© अमर.

"अमावस की चांदनी"

अमावस है आज 
चाँद नहीं है,
पक्का यकीं है,
है इत्मीनान भी,
उसी दिन से,

जब पहली बार,
देखा था उसे,
कुछ टूटा सा,
उसका हर अपब्र्हंश
संजो लेती हूँ मैं
आँखों के समंदर में,

वो पिघलकर ,
बढा देता हरदिन ,
मेरी आँखों की चांदनी ,
फ़ना है अब चाँद
खुद के वजूद से .

बस इसी पल से मैं
लगूंगी लौटाने
कतरा कतरा,
वजूद चाँद का
रफ्ता रफ्ता चाँद
फिर पा लेगा
अपनी सम्पूर्णता
बिना मुझे
खंडित किये .............© अमर.

जियो कुछ इस अंदाज़ से "अमर" मरने का गम न रहे ,
जिंदगी के मकान में खुशियों के किरायेदार कम न रहे 
मुस्कुराहटों के रंगीं लिफाफों में किराये से लम्हे आते रहें 
हर साल खुशियों के मकां को मंजिल दर मंजिल बढ़ाते रहें !!... © अमर.