जाओ तुम,
गर जाना चाहो,
खुदाया प्यार को,
न निभाओ तुम.
जिया था हमने
एक ही प्यार,
निभाते हुए,
दुनियादारी.
दुखता है दिल,
निभ रहा,
प्यार अब.
जीने लगी
दुनियादारी.
याद तो होगा,
जब होते थे हम,
कोई नहीं,
कोई भी नहीं,
न आया कभी,
दरमियाँ हमारे.
देख लो आज
बीच में है
अक्ल
अगल़ात
अज़ाब
अफ़सोस
तुम इस छोर
और मैं उस छोर....
____________कॉपीराइट © अमर सिंह तंवर
अक़्ल= बुद्धि, तर्क,
अगल़ात= अशुद्धियां
अज़ाब= पीड़ा, सन्ताप, दंड
अफ़सोस= शोक, पछतावा, उदासी




