Tuesday, 6 May 2014


चारों ओर 

कोलाहल में 


आवाजों से


बोझिल 


माहौल में 


कविताओ 


शेरों की दाद में 


अनकहा पढ़े जाने 


की आस में 


अवचेतन गहने के 


विश्वास में 


जो अबोला है 


निगाहों का 


पहरा है 


फिर भी दरम्यां 


ठहरा है 


जो "मौन" है 


उसे मौन ही 


रखना 


उतावली में 


न कहना 


चाहता हूँ 


पढ़ते हुए 


खामोशियों को 


परत दर परत 


बीतूं मैं भी..


छोटी है खुशियाँ 


राह-ए-जिंदगी 


है लम्बी बहुत........© 2014 अमर.


न होकर भी थी 
तुम साथ मेरे 
जब वादियों में 
उतरती थी 
शाम की 
परछाईयां 
घुल रहे थे 
ख्याल मेरे 
लिपटकर रेशमी 
अहसासों से तेरे 
देवदार के पीछे 
लाल पिरामिड सी 
छत वाले 
मकान की ओट में 
आसमां भी 
झुक आया था 
बेशर्म सा 
न जाने क्यूँ 
इतने करीब 
सुर्ख सेबों 
का रंग 
उतर आया था 
गालों पर 
तुम्हारे 
पता है 

कितने 
इन्द्रधनुष 
लौटते सूरज की 
रश्मियाँ 
बना गयी थी 
आँखों में तुम्हारी 
मैं बावरे सा 
अपलक 
और तुम 
इन्द्रधनुषी रंगों में 
सराबोर 
जज़्ब कर रही थी 
कतरा कतरा 
पिघलते लम्हों को 
देखा था मैंने 
बहने लगी थी 
चोटियों पर 
ज़मी बर्फ भी ..........© 2014 अमर

गवारा नहीं 
 
रखूं अमानती 

 
सीपियों को 

 
किसी 

 
शो केस में, 

 
रखता हूँ उन्हें 

 
मन की तिजोरी 

 
मखमल की तह में 

 
छुपाकर सबसे 

 
मचलती है लहरें 

 
किनारों के 

 
एक स्पर्श 

 
भर के लिए 



लौट जाती है 

 
फिर आने के लिए 

 
जिंदगी की रेत पर 

 
निशां छोड़कर 

 
दे जाती है अपने 

 
मन की सीपी में छुपे 

 
मोतियों से अहसास 

 
ताउम्र सहेज कर

 
रखने के लिए ...........© अमर (२०१४)