Tuesday, 9 July 2013

ग़ज़ल_"पहल"


पहल कीजिये हल निकलेगा 
जिंदगी है कोई ख्वाब तो नहीं.

चमकती  है तेरी आँखों में जो 
तनहा अश्कों की आब तो नहीं 

मचलता है दिल जब बरसे घटा 
अहसास है ये कोई ख़िताब तो नहीं  

हसीं बहुत है कमबख्त दर्द-ए-मुहब्बत
ये तोहफा है तेरा कोई अजाब तो नहीं 

झुका है सर मेरे इश्क के सामने 
शख्शियत को तेरी आदाब तो नहीं 

खुला हूँ कि पढ़ लें हाल- ए- दिल 
आशिक हूँ मैं कोई किताब तो नहीं.
______________अमर सिंह तंवर (०४ .०७.२०१३

1 comment:

  1. हसीं बहुत है कमबख्त दर्द-ए-मुहब्बत
    ये तोहफा है तेरा कोई अजाब तो नहीं

    खुला हूँ कि पढ़ लें हाल- ए- दिल
    आशिक हूँ मैं कोई किताब तो नहीं/ badiya sher kahe aapne Amar

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