Tuesday, 6 May 2014



न होकर भी थी 
तुम साथ मेरे 
जब वादियों में 
उतरती थी 
शाम की 
परछाईयां 
घुल रहे थे 
ख्याल मेरे 
लिपटकर रेशमी 
अहसासों से तेरे 
देवदार के पीछे 
लाल पिरामिड सी 
छत वाले 
मकान की ओट में 
आसमां भी 
झुक आया था 
बेशर्म सा 
न जाने क्यूँ 
इतने करीब 
सुर्ख सेबों 
का रंग 
उतर आया था 
गालों पर 
तुम्हारे 
पता है 

कितने 
इन्द्रधनुष 
लौटते सूरज की 
रश्मियाँ 
बना गयी थी 
आँखों में तुम्हारी 
मैं बावरे सा 
अपलक 
और तुम 
इन्द्रधनुषी रंगों में 
सराबोर 
जज़्ब कर रही थी 
कतरा कतरा 
पिघलते लम्हों को 
देखा था मैंने 
बहने लगी थी 
चोटियों पर 
ज़मी बर्फ भी ..........© 2014 अमर

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