गवारा नहीं
रखूं अमानती
सीपियों को
किसी
शो केस में,
रखता हूँ उन्हें
मन की तिजोरी
मखमल की तह में
छुपाकर सबसे
मचलती है लहरें
किनारों के
एक स्पर्श
भर के लिए
लौट जाती है
फिर आने के लिए
जिंदगी की रेत पर
निशां छोड़कर
दे जाती है अपने
मन की सीपी में छुपे
मोतियों से अहसास
ताउम्र सहेज कर
रखने के लिए ...........© अमर (२०१४)

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