Wednesday, 24 July 2013

ग़ज़ल.



एक ख्वाब था अधुरा सा 
कोई गुज़रे दिल की राहों में.

जाज़िब है ज़ज्बा-ए-मुहब्बत 

क्यों डुबोना दिल को आहों में 

हम भी कभी बैठें फुर्सत से 

ए मुहब्बत तेरी पनाहों  में.

कुछ ख्वाब मुख़्तसर देखें हैं 
जिंदगी हमने तेरी निगाहों में.

इलज़ाम "अमर" हम सर लेंगे 

है नाम-ए-मुहब्बत गर गुनाहों में
__________@अमर सिंह तंवर.


जज़्बा=  आवेश, आवेग
जाज़िब= मनमोहक, आकर्षक

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