Tuesday, 6 May 2014


चारों ओर 

कोलाहल में 


आवाजों से


बोझिल 


माहौल में 


कविताओ 


शेरों की दाद में 


अनकहा पढ़े जाने 


की आस में 


अवचेतन गहने के 


विश्वास में 


जो अबोला है 


निगाहों का 


पहरा है 


फिर भी दरम्यां 


ठहरा है 


जो "मौन" है 


उसे मौन ही 


रखना 


उतावली में 


न कहना 


चाहता हूँ 


पढ़ते हुए 


खामोशियों को 


परत दर परत 


बीतूं मैं भी..


छोटी है खुशियाँ 


राह-ए-जिंदगी 


है लम्बी बहुत........© 2014 अमर.

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