Monday, 10 June 2013

अश्क -ए-जुदाई

_____________________ग़ज़ल_____________________

पीकर अश्क -ए-जुदाई ,करते रहते गला तर,
हिचकियाँ भी कमबख्त,अब आती नहीं हैं.



तेरे पीछे बहुत दूर तलक गयी नज़रें मेरी,
खुश्क हुई आँखों में अब. लौट कर आती नहीं है.



यूँ तो दुनिया मेरे लिए, पहले भी थी अजनबी,
तुझसे अलहदा पहचान मेरी, अब होती नहीं है.



इस तरहा बीमार ए दिल है. मुहब्बत का तेरी,
जिसे लग जाये ये बीमारी, कमबख्त जाती नहीं है.



जलता रहे दिल, तेरी झूंठी बेरुखी की आग से,
रहम की भीगी ठंडी हवाएं, मुझे कभी भाती नहीं है
.


_____________कॉपीराइट@ अमरसिंह तंवर

1 comment:

  1. बढ़िया ग़ज़ल....
    रहम की भीगी ठंडी हवाएं, मुझे कभी भाती नहीं है.
    too good!!!

    अनु

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