मन मुसाफिर ठिठका है जिन ठिकानो पर...बस वही की बानगी नज़र करता हूँ ......मेरे शब्दों में कुछ द्रश्य ....
Tuesday, 18 June 2013
त्रासदी तेरे दर पर (केदारनाथ पर तबाही सी व्यथित मन कि व्यथा)
माना कि "अमर" नहीं होता कोई ,
अकाल मौतों का तांडव तेरे दर पर!!
ढहा दिया वो यकीन भी साथ घरों के,
चलते थे जो आँखे मूंदे तेरी डगर पर !!
यकीनन वहां नहीं हो तुम प्रभु ,
जहाँ लोग मन्नत मांगने आते है !!
बेईमानी,भ्रष्टाचार की गंगा में नहाते,
दान देकर पत्थर पर नाम लिखाते है!!
तुम तो बसते प्रभु मानव मन में,
मेहनतकश मजलूमों में नज़र आते हो !!
जब मिले उनको सहज अर्पण सम्मान,
उनकी दुआओं में तुम असर कर जाते हो !!
____________@अमर सिंह तंवर (19.06.2013)
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