घूमतें है इंद्र कई ,
गौतम के रूप मैं,
कई अहिल्या पाषाण बनी,
साजिशों की धूप में,
आब गयी ,अहसास गए,
आत्मा हुई पत्थर इस परिवेश में,
छुने से भी कहाँ उद्धार होगा,
मिलते रावण यहाँ राम के भेष में,
हर आंसू एक पत्थर है ,
ये जो पहाड़ देखते हो ,
आहों के ताप से तडकती चट्टानों में
कैक्टस के शूल बनकर चुभते हो ...
_______कॉपीराइट © अमर सिंह तंवर
गौतम के रूप मैं,
कई अहिल्या पाषाण बनी,
साजिशों की धूप में,
आब गयी ,अहसास गए,
आत्मा हुई पत्थर इस परिवेश में,
छुने से भी कहाँ उद्धार होगा,
मिलते रावण यहाँ राम के भेष में,
हर आंसू एक पत्थर है ,
ये जो पहाड़ देखते हो ,
आहों के ताप से तडकती चट्टानों में
कैक्टस के शूल बनकर चुभते हो ...
_______कॉपीराइट © अमर सिंह तंवर

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