रिश्ते
राह तकते
खोई हुई
खुशियों की
वो फ़रिश्ते
बनकर बैठे है
ओढ़ चादर
अच्छाइयों की
तमन्नाएँ
घुट रही
दायरों के
कसाव से
मनुष्य है,
ज्वार तो उठेगा
हद में छलके
तो हैं महफूज़ किनारे .
_____________________________© अमर सिंह तंवर
राह तकते
खोई हुई
खुशियों की
वो फ़रिश्ते
बनकर बैठे है
ओढ़ चादर
अच्छाइयों की
तमन्नाएँ
घुट रही
दायरों के
कसाव से
मनुष्य है,
ज्वार तो उठेगा
हद में छलके
तो हैं महफूज़ किनारे .
_____________________________© अमर सिंह तंवर
वाह....
ReplyDeleteहद में छलके
तो खतरा क्या..?
बहुत सुन्दर...
अनु