Thursday, 13 June 2013

मायूसियाँ

लाख बरसे बादल तो क्या ,
खुश्क आँखों में नमी आती नहीं ,
खुशियाँ खोजती जिंदगी की,
ग़मों से अदावत जाती नहीं  

लाख बिखेरो फूल फिजां में ,
डाल से टूटकर खुशबु आती नहीं,
एक बार जो लगी घुन रिश्तों को,
फिर कभी सलामती पे आती नहीं 

झूठी मुस्कुराहटें ,झूठे फ़साने 
जिंदगी अब तराने सुनाती नहीं 
मायूसियों की धुंध जो छाई हम पर 
हमदर्दी की किरणों से जाती नहीं.
______________copyright @अमर सिंह तंवर.

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