Wednesday, 12 June 2013

तमन्नाएँ

रिश्ते
राह तकते
खोई हुई
खुशियों की

वो फ़रिश्ते
बनकर बैठे है
ओढ़ चादर
अच्छाइयों की

तमन्नाएँ
घुट रही
दायरों के
कसाव से

मनुष्य है,
ज्वार तो उठेगा
हद में छलके
तो हैं महफूज़ किनारे .
_____________________________© अमर सिंह तंवर



1 comment:

  1. वाह....
    हद में छलके
    तो खतरा क्या..?
    बहुत सुन्दर...

    अनु

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