गुलों को देखा जो खिलते ,
तेरे चेहरे पे एतबार आ गया,
देख कर रंगत सुर्ख गुलाबों की,
तेरे रुखसारों पे एतबार आ गया,
भीगे मौसम में छाई काली घटा,
तेरे गेसुओं पे एतबार आ गया.
दूर कहीं फिर कोयल कूकी,
तेरी आवाज़ पे एतबार आ गया,
बैठा रहा था झील किनारे,
तेरी आँखों पे एतबार आ गया,
दरिया सी तेरी सीरत देखी,
खुदा की खुदाई पे एतबार आ गया...-© अमर सिंह तंवर
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