कुछ ऐसा ही हूँ मैं और ये मन मेरा ,कभी गंभीरता के पर्वतों पर चिंतन के शिखर पर घंटो आँखे मूंदे ध्यान मग्न रहता है ,कभी सीधे छलांग लगा कर खेलने लगता है तलहटी की बचपनी मिटटी में ,कभी तमतमा जाता चेहरा व्यवस्था का नाकारापन देख कर तो कभी पेड़ से टूटते पुराने पत्ते को देख दुखी हो उठता है, कभी दहका पलाश तमन्नाओ को गरमा जाता है,तो कभी सुध बुध खो बैठता है अहसासों की ओस से भीगे गुलाबों को देखकर,हर अहसास शब्दों की बारात लेकर आता है ,और मेरी कविता रक्स करने लगती है......© अमर.

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