Thursday, 9 May 2013

"अमावस की चांदनी"

अमावस है आज 
चाँद नहीं है,
पक्का यकीं है,
है इत्मीनान भी,
उसी दिन से,

जब पहली बार,
देखा था उसे,
कुछ टूटा सा,
उसका हर अपब्र्हंश
संजो लेती हूँ मैं
आँखों के समंदर में,

वो पिघलकर ,
बढा देता हरदिन ,
मेरी आँखों की चांदनी ,
फ़ना है अब चाँद
खुद के वजूद से .

बस इसी पल से मैं
लगूंगी लौटाने
कतरा कतरा,
वजूद चाँद का
रफ्ता रफ्ता चाँद
फिर पा लेगा
अपनी सम्पूर्णता
बिना मुझे
खंडित किये .............© अमर.

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