पीले पड़े जूने अख़बार सी ,
जिंदगी में कुछ हर्फ़ ,
उभरे हैं गहरे ,
तैयार है इबारतें कुछ ,
मिटने की बैचैनी लिए !
गर्द ज़माने की समां गई,
वक़्त की हर तहों में,
सिलवटें पड़ी यादों में,
जहाँ जहाँ से मोड़ी गयी !
कुछ चित्र भी है,
जुगाड़े हुए लम्हों के.
बदरंग से अब लगते हैं,
दास्तां मुकम्मल कहते हैं !
कुछ है इश्तेहार,
तेरी बागी तमन्नाओं के,
यूँ ही अब भी मुस्कुराते हैं
चाहत के चश्मे से
जब भी नज़र आते हैं !......© अमर.
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