Thursday, 23 May 2013

दिलासा


मुझको यारों माफ़ करना ....

मेरी तनहाइयों में 
कडवे घूँट भरती है 
अंगूरी रातों की,
खट्टी मीठी कहानियां.

उल्टा लटका चाँद भी 
कह कहे लगाता है,
मुझको दिलासा देने जब 
तेरा फ़ोन आता है.

गुजरती रेल की सीटियाँ आती है 
नेपथ्य में मेरे गूंजती जाती है ,
इंजन से ज्यादा धुआं लिए हुए हूँ 
हाँ तेरी याद में आज पिए हुए हूँ...........© अमर.

No comments:

Post a Comment